तूफानी लहरें हो , अम्बर के पहरे हो ,
पुरवा के दामन पर दाग बहुत गहरे हो,
सागर के मांझी मत मन को तू हारना,
जीवन के क्रम में जो खोया है , पाया है,
पतझड़ का मतलब है फिर बसंत आना है....
राजवंश रूठे तो, राजमुकुट टूटे तो,
सीतापति-राम से राजमहल छूटे तो,
आशा मत हार, पार सागर के एक बार,
पत्थर में प्राण फूंक सेतु फिर बनाना है,
पतझड़ का मतलब है फिर बसंत आना है...
घर भर चाहे छोड़े, सूरज भी मुंह मोड़े,
विदुर रहे मौन, छीने राज्य, स्वर्ण रथ, घोड़े,
माँ का बस प्यार, सार गीता का साथ रहे,
पंचतत्व सौ पर है भारी, बतलाना है,
जीवन का राजसूय यज्ञ फिर कराना है,
पतझड़ का मतलब है फिर बसंत आना है...
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