Thursday, February 21, 2013

आ: धरती कितना देती है ! - सुमित्रा नंदन पन्त

मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे,
सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे ,
रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी,
और फूल फलकर मैं मोटा सेठ बनूँगा !

पर बंजर धरती में एक न अंकुर फूटा,
वन्ध्या मिटटी ने न एक भी पैसा उगला !
सपने जाने कहाँ मिटे, कब धूल  हो गए !
मैं हताश हो, बाट जोहता रहा दिनों तक,
बाल कल्पना के अपलक पांवड़े बिछाकर !
मैं अबोध था, मैंने गलत बीज बोये थे,
ममता को रोप था, तृष्णा को सींचा था !

अर्धशती हहराती निकल गयी है तब से !
कितने ही मधु पतझर बीत गए अनजाने,
ग्रीष्म तपे , वर्षा झूली, शरदें मुस्काई,
सी-सी कर हेमंत कँपे , तरु झरे, खिले वन !
औ' जब फिर से गाढ़ी ऊदी लालसा लिए,
गहरे कजरारे बादल बरसे धरती पर,
मैंने, कौतूहलवश, आँगन के कोने की
गीली तह को यों ही ऊंगली से सहलाकर
बीज सेम के दबा दिए मिटटी के नीचे !
भू के अंचल में मणि मानिक बाँध दिए हों !

मैं फिर भूल गया इस छोटी-सी घटना को ;
और बात भी क्या थी, याद जिसे रखता मन !
किन्तु, एक दिन, जब मैं संध्या को आँगन में
टहल रहा था - तब सहसा मैंने जो देखा !
उससे हर्ष विमूढ़ हो उठा मैं विस्मय से !
देखा, आँगन के कोने में कई नवागत
छोटी-छोटी चाता ताने हुए खड़े हैं !
चाता कहूं की विजय पताकाएं जीवन की ,
या हथेलियाँ खोले थे वे नन्ही, प्यारी -
जो भी हो, वे हरे हरे उल्लास से भरे
पंख मार कर उड़ने को उत्सुक लगते थे,
डिम्ब तोड़कर निकले चिड़िया के बच्चों - से !

निर्मिमेष, क्षण भर, मैं उनको रहा देखता,
सहसा मुझे स्मरण हो आया, कुछ दिन पहले,
बीज सेम के रोप थे मैंने आँगन में,
और उन्हीं से बौने पौधों की यह पलटन
मेरी आँखों के सम्मुख अब खड़ी गर्व से
नन्हे नाटे पैर पटक, बढती जाती है !
तब से उनको रहा देखता - धीरे धीरे
अनगिनत पत्तों से लद , भर गयी झाड़ियाँ
हरे भरे तंग गए कई मखमली, चंदोवे !
बेलें फ़ैल गयी बल खा, आँगन में लहरा, -
और सहारा लेकर बाड़े की टट्टी का
हरे हरे सौ झरने फूट पड़े ऊपर को !
मैं अवाक रह गया वंश कैसे बढ़ता है !
छोटे, तारों - से छितरे, फूलों के छींटे
झागों- से लिपटे लहरी श्यामल लतरों पर
सुन्दर लगते थे, मानस के हंसमुख नभ-से,
चोटी  के मोती-से, आँचल के बूंटों-से !

ओह, समय पर उनमें कितनी फलियाँ टूटी !
कितनी साड़ी फलियाँ, कितनी प्यारी फलियाँ,
पतली चौड़ी फलियाँ, - उफ, उनकी क्या गिनती !
लम्बी लम्बी अंगुलियाँ - सी, नन्हीं नन्हीं
तलवारों - सी, पन्ने के प्यारे हीरों - सी,
झूठ न समझें, चन्द्र कलाओं-सी नित बढती,
सच्चे मोती की लड़ियों - सी, ढेर ढेर खिल,
झुण्ड-झुण्ड भिलमिलकर कचपचिया तारों-सी !
आ: इतनी फलियाँ टूटीं, जाड़ों भर खायी,
सुबह शाम वे घर-घर पकीं, पड़ोस पास के
जाने अनजाने सब लोगों में बंटवाई,
बंधु , बांधवों, मित्रों,अभ्यागत मंगतों ने
जी भर-भर दिन-रात मोहल्ले भर ने खाईं !
कितनी सारी फलियाँ ! कितनी प्यारी फलियाँ !

यह धरती कितना देती है ! धरती माता
कितना देती है अपने प्यारे पुत्रों को !
नहीं समझ पाया था मैं उसके महत्त्व को !
बचपन में, छि: स्वार्थ लोभ वश पैसे बोकर ।

रत्न प्रसविनी है वसुधा, अब समझ सका हूँ ।
इसमें सच्ची समता के दाने बोने हैं ,
इसमें जन की क्षमता के दाने बोने हैं ,
जिससे उगल सके फिर धुल सुनहली फसलें
मानवता की-जीवन श्रम से हंसें दिशायें !
हम जैसा बोयेंगे वैसा ही पायेंगे ।

Friday, February 24, 2012

तुम मुझको करना माफ़ प्रिये - डॉ कुमार विश्वास

ओ कल्पवृक्ष की सोन जूही , ओ अमलतास की अमर कली ,
धरती के आताप से जलते,मन पर छाई  निर्मल  बदली,
मैं तुमको मधु-सद गंध-युक्त संसार नहीं दे पाऊंगा,
तुम मुझको करना माफ़ प्रिये, मैं प्यार नहीं दे पाऊंगा...

तुम कल्पवृक्ष का फूल और मैं धरती का अदना गायक,
तुम जीवन के उपभोग योग, मैं नहीं अधूरी ग़ज़ल शुभे,
तुम साम गान सी पावन हो,हिमशिखरों  पे सहसा कौंधा,
बिजुरी सी तुम मन भावन हो, इसलिए व्यर्थ शब्दों वाला, व्यापार नहीं दे पाऊंगा ,
तुम मुझको करना माफ़ प्रिये , मैं प्यार नहीं दे पाऊंगा...

तुम जिस शैय्या पर शयन करो, वो क्षीर सिंध  सी पावन हो,
जिस आँगन की हो  मौलश्री , वो  आँगन क्या वृन्दावन हो,
जिन अधरों  का चुम्बन  पाओ , वे  अधर नहीं गंगा तट हों,
जिसकी छाया बन साथ रहो , वो व्यक्ति नहीं वंशी-वट हो,
पर मैं वट जैसा सघन छाँव, विस्तार नहीं  दे पाऊंगा,
तुम मुझको करना माफ़ प्रिये, मैं प्यार नहीं दे पाऊंगा...

मैं तुमको चाँद सितारों का सौपूं उपहार भला कैसे ?
मैं यायावर बंजारा साधू सुर-संसार भला कैसे,
मैं जीवन के प्रश्नों से नाता तोड़, तुम्हारे साथ शुभे,
बारूद बिछी धरती पर कर लूं दो पल प्यार भला कैसे?
इसलिए विवश हर आसों को , सत्कार नहीं दे पाऊंगा,
तुम मुझको करना माफ़ प्रिये, मैं प्यार नहीं दे पाऊंगा...

Saturday, February 18, 2012

फिर बसंत आना है - डॉ कुमार विश्वास


तूफानी लहरें हो , अम्बर के पहरे हो ,
पुरवा के दामन पर दाग बहुत गहरे हो,
सागर के मांझी मत मन को तू हारना,
जीवन के क्रम में जो खोया है , पाया है,
पतझड़ का मतलब है फिर बसंत आना है....

राजवंश रूठे तो, राजमुकुट टूटे तो,
सीतापति-राम से राजमहल छूटे तो,
आशा मत हार, पार सागर के एक बार,
पत्थर में प्राण फूंक सेतु फिर बनाना है,
पतझड़ का मतलब है फिर बसंत आना है...

घर भर चाहे छोड़े, सूरज भी मुंह मोड़े,
विदुर रहे मौन, छीने राज्य, स्वर्ण रथ, घोड़े,
माँ का बस प्यार, सार गीता का साथ रहे,
पंचतत्व सौ पर है भारी, बतलाना है,
जीवन का राजसूय यज्ञ फिर कराना है,
पतझड़ का मतलब है फिर बसंत आना है...

पनाहों में जो आये हो - डॉ कुमार विश्वास


जिसकी धुन पर दुनिया नाचे, दिल ऐसा एक इकतारा है,
जो हमको भी प्यारा है, और जो तुमको भी प्यारा है,
झूम रही है सारी दुनिया , जबकि हमारे गीतों पर,
तब कहती हो प्यार हुआ है, क्या एहसान तुम्हारा है |

जो धरती से अम्बर जोड़े, उसका नाम मोहब्बत है,
जो शीशे से पत्थर तोड़े , उसका नाम मोहब्बत है,
कतरा कतरा सागर तक तो, जाती है हर उम्र मगर,
बहता दरिया वापस मोड़े, उसका नाम मोहब्बत है |

पनाहों में जो आया हो तो उसपे वार क्या करना?
जो दिल हारा हुआ हो, उस पे फिर अधिकार क्या करना?
मोहब्बत का मज़ा तो डूबने की कशमकश में है,
जोहो मालूम गहराई, तो दरिया पार क्या करना?

बस्ती बस्ती घोर उदासी पर्वत पर्वत खालीपन,
मन हीरा बेमोल बिक गया घिस घिस रीता तनचंदन,
इस धरती से उस अम्बर तक दो ही चीज़ ग़ज़ब की है,
एक तो  तेरा भोलापन है , एक मेरा दीवानापन |

तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है समझता हूँ,
तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है समझता हूँ,
तुम्हें मैं भूल जाऊँगा ये मुमकिन है नहीं लेकिन,
तुम्ही को भूलना सबसे ज़रूरी है समझता हूँ |



तुम न आयी - डॉ. कुमार विश्वास

 तुम अगर नहीं आयी... गीत गा ना पाऊंगा..
सांस साथ छोड़ेगी सुर सजा ना पाऊंगा..
तान भावना की है.. शब्द शब्द दर्पण है..
बांसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है..

तुम बिना हथेली की हर लकीर प्यासी है,
तीर पार कान्हा से दूर राधिका सी है,
दूरियां समझती हैं दर्द कैसे सहना है,
आँख लाख चाहे पर होंठ को ना कहना है..
औषधि चली आओ.. चोट का निमंत्रण है..
बांसुरी चली आओ होंठ का निमंत्रण है...

तुम अलग हुई मुझसे सांस की खताओं से,
भूख की दलीलों से, वक़्त की सजाओं ने
रात की उदासी को आंसुओं ने झेला है,
कुछ गलत न कर बैठे, मन बहुत अकेला है,
कंचन कसौटी की खोट न निमंत्रण है,
बांसुरी चली आओ.. होंठ का निमंत्रण है...

वो पगली लड़की - डॉ. कुमार विश्वास


अमावास की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है,
जब दर्द की प्याली रातों में गम आंसू के संग होते हैं,
जब पिछवाड़े के कमरे में हम निपट अकेले सोते हैं,
जब घड़ियाँ टिक-टिक चलती हैं, सब सोते हैं, हम रोते हैं,
जब बार बार दोहराने से सारी यादें चुक जाती हैं,
जब ऊँच-नीच समझाने में माथे की नस दुःख जाती है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है |

जब पोथे खाली होते हैं, जब हार सवाली होते हैं,
जब गज़लें रास नहीं आती, अफ़साने गाली होते हैं,
जब बासी फीकी धूप समेटे दिन जल्दी ढल जाता है,
जब सूरज का लश्कर छत से गलियों में देर से जाता है,
जब जल्दी घर जाने की इच्छा मन ही मन घुट जाती है,
जब कॉलेज से घर लाने वाली पहली बस छूट जाती है,
जब बेमन से खाना खाने पर माँ गुस्सा हो जाती है,
जब लाख मन करने पर भी पारो पढने आ जाती है,
जब अपना हर मनचाहा काम कोई लाचारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है |

जब कमरे में सन्नाटे की आवाज़ सुनायी देती है,
जब दर्पण में आँखों के नीचे झी दिखाई देती है,
जब बडकी भाभी कहती हैं, कुछ सेहत का भी ध्यान करो,
क्या लिखते हो दिनभर, कुछ सपनों का भी सम्मान करो,
जब बाबा वाली बैठक में कुछ रिश्ते वाले आते हैं,
जब बाबा हमें बुलाते हैं, हम जाते हैं, घबराते हैं,
जब साडी पहने एक लड़की का फोटो लाया जाता है,
जब भाभी हमें मनाती हैं, फोटो दिखलाया जाता है,
जब सारे घर का मानना हमको फनकारी लगता है,
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है |

दीदी कहती हैं उस पगली लड़की की कोई औकात नहीं,
उसके दिल में भैय्या तेरे जैसे प्यारे जज़्बात नहीं,
वो पगली लड़की नौ दिन मेरे लिए भूखी रहती है,
छुप-छुप सारे व्रत रखती है, पर मुझसे कभी न कहती है,
जो पगली लड़की कहती है, मैं प्यार तुम्ही से करती हूँ,
लेकिन मैं हूँ मजबूर बहुत, अम्मा-बाबा से डरती हूँ,
उस पगली लड़की पर अपना कुछ अधिकार नहीं बाबा,
ये कथा-कहानी किस्से हैं, कुछ भी तो सार नहीं बाबा,
बस उस पगली लड़की के संग जीना फुलवारी लगता है,
और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है |

कोई दीवाना कहता है - डॉ. कुमार विश्वास

कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ तू मुझसे दूर कैसी है
ये तेरा दिल समझता है, ये मेरा दिल समझता है

के मोहब्बत एक एहसासों की पवन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है
यहाँ सब लोग कहते हैं मेरी आँखों में आंसू हैं 
जो तू समझे तो मोती हैं, जो न समझे तो पानी है 

मत पूछ की क्या हाल है मेरा तेरे आगे
तू देख के क्या रंग है तेरा मेरे आगे

समंदर पीर के अन्दर है लेकिन रो नहीं सकता
ये आंसू प्यार के मोती हैं इनको खो नहीं सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो  नहीं सकता

भ्रमर कोई कुमिदिनी पर मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का
मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा

कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ, तू मुझसे दूर कैसी है
ये तेरा दिल समझता है , ये मेरा दिल समझता है

बहुत बिखरा बहुत टूटा थपेड़े सह नहीं पाया
हवाओं के इशारों पर मगर मैं बह नहीं पाया
अधूरा अनसुना ही रह गया ये प्यार का किस्सा
कभी तुम सुन नहीं पाए, कभी मैं कह नहीं पाया

मैं उसका हूँ वो  इस एहसास से इनकार करता है
भरी महफ़िल में भी रुसवा वो हर बार करता है
यकीं है सारी दुनिया को ख़फा है हमसे वो लेकिन
मुझे मालूम है फिर भी मुझी से प्यार करता है

मैं जब भी तेज़ चलता हूँ नज़ारे छूट जाते हैं
कोई जब रूप गढ़ता हूँ तो सांचे टूट जाते हैं
मैं रोता हूँ तो आकर लोग कन्धा थपथपाते हैं
मैं हँसता हूँ तो अक्सर लोग मुझसे रूठ जाते हैं

मत पूछ की क्या हाल है मेरा तेरे आगे
तू देख क्या रंग है तेरा मेरे आगे

समंदर पीर के अन्दर है लेकिन रो नहीं सकता
ये आंसू प्यार के मोती हैं इनको खो नहीं सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता....