ओ कल्पवृक्ष की सोन जूही , ओ अमलतास की अमर कली ,
धरती के आताप से जलते,मन पर छाई निर्मल बदली,
मैं तुमको मधु-सद गंध-युक्त संसार नहीं दे पाऊंगा,
तुम मुझको करना माफ़ प्रिये, मैं प्यार नहीं दे पाऊंगा...
तुम कल्पवृक्ष का फूल और मैं धरती का अदना गायक,
तुम जीवन के उपभोग योग, मैं नहीं अधूरी ग़ज़ल शुभे,
तुम साम गान सी पावन हो,हिमशिखरों पे सहसा कौंधा,
बिजुरी सी तुम मन भावन हो, इसलिए व्यर्थ शब्दों वाला, व्यापार नहीं दे पाऊंगा ,
तुम मुझको करना माफ़ प्रिये , मैं प्यार नहीं दे पाऊंगा...
तुम जिस शैय्या पर शयन करो, वो क्षीर सिंध सी पावन हो,
जिस आँगन की हो मौलश्री , वो आँगन क्या वृन्दावन हो,
जिन अधरों का चुम्बन पाओ , वे अधर नहीं गंगा तट हों,
जिसकी छाया बन साथ रहो , वो व्यक्ति नहीं वंशी-वट हो,
पर मैं वट जैसा सघन छाँव, विस्तार नहीं दे पाऊंगा,
तुम मुझको करना माफ़ प्रिये, मैं प्यार नहीं दे पाऊंगा...
मैं तुमको चाँद सितारों का सौपूं उपहार भला कैसे ?
मैं यायावर बंजारा साधू सुर-संसार भला कैसे,
मैं जीवन के प्रश्नों से नाता तोड़, तुम्हारे साथ शुभे,
बारूद बिछी धरती पर कर लूं दो पल प्यार भला कैसे?
इसलिए विवश हर आसों को , सत्कार नहीं दे पाऊंगा,
तुम मुझको करना माफ़ प्रिये, मैं प्यार नहीं दे पाऊंगा...
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